इस अनगिनत भीड़ में तुम दो कदम भी
आगे बढ पाओ तो बहुत होगा
हर तरफ कीचड़ ही कीचड़ है बच के
निकल पाओ तो बहुत होगा
हर कोई देखता है शक की नजर
से यंहा,किशी से दिल खोल मिल् पाओ तो बहुत होगा
तेरे नाम वाले कितने ही मिल
जायेंगे यंहा, तुम अपनी पहचान बन पाओ तो बहुत होगा
कोई फ़िक्र में, कोई लालच में कोई
जिम्मेदारी समझकर जी रहा है यंहा
तुम इससे बाहर निकल पाओ तो बहुत
होगा
तेरी जिन्दगी तुझ पर कर्ज़ है
यंहा किसी का,बस इतना समझ पाओगे तो बहुत होगा.
"मावल"तो योंही उलझ कर रह गया है यंहा, तुम इन उलझनों से बच पाओ
तो बहुत होगा.
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